Tuesday, 20 June 2017

कडवी सच्चाई: किसान और उद्योगपति

एक कडवी सच्चाई:

1 लाख करोड कर्ज भारत के 34बडे उद्योगपत्तियों ने देना है मगर उन 34 पर कोई कार्रवाई नहीं


जबकि 1लाख30हजार करोड देशभर के करोडों किसानों ने देना है, इन किसानों के नाम बैंक में डिफाल्टरों की सूची में टांगकर बेइज्जत किया जाता हैं, मजबूर किसान के घर बैंक के आधिकारियों को भेजकर मानसिक प्रताडना दी जाती है किसान को आत्महत्या की ओर धकेला जाता है, किसान अपना पारिवारिक जीवन नहीं संभाल पाता, जबकि इसके उलट एक कर्जदार उद्योगपति ऐश-परस्ती करता रहता है


उद्योगपति अपनी फर्म को दिवालिया दर्शा बच जाता है, मगर किसान मौसम की मार से आत्महत्या करने को तैयार हो जाता है, और सरकारें मुआवजे का खेल खेलती हैं किसानों की बदहाली का मजाक उडाती हैं, 10हजार मुआवजा तब मिलेगा जब किसान शतप्रतिशत बर्वाद होगा, मतलब जब किसान पूर्णरूप से खत्म हो जायेगा, सरकारों का राजनीतिक मकसद पूरा हो जायेगा!!


ऐसे हालात हैं उस देश के जहां किसानों को सिर्फ किताबों में पूजा जाता है अन्नदाता कहा जाता है, चुनावी रैलियों में एक दल दूसरे दल को किसानों की दुर्दशा का जिम्मेवार ठहराता मगर किसानों को मिलते हैं आश्वासन, जमीन छीनने वाले अध्यादेश और उद्योगपत्तियों को मिलती है टैक्स में प्रतिशत छूट, छूट मतलब देश के सरकारी खजाने को लाखों करोडों का घाटा




"किसान का बेटा हूं, किसान की सच्चाई लिखता हूं, देश की कडवी दवा पीने के लिये क्या सिर्फ किसान और मध्यमवर्गीय आय वाले परिवार हैं, हां शायद ये ही हैं जो चुनावी चन्दा नहीं, ये ही हैं जो हैलीकॉप्टर खरीद कर नहीं दे सकते, हम सिर्फ वोट दे सकते हैं हर बार आपको सत्ता से बेदखल कर सकते हैं"


"कोई हमारी पुकार सुनने वाला भी हो, हमें सिर्फ चुनावी रैलियों में किसान हितैषी वाला नहीं चाहिये, हमें चाहिये जो "अन्नदाता सुखी भव: थाली उलटी करके ना लिखे, ब्लकि अन्नदाता को सुखी रखने के लिये कार्य करे"


राहुल काजल (छोटा सा किसान हितैषी)


"दुख दर्द देखे हैं मैंने, कैसे कहदूं ज्यादा जमीन वाला किसान भी जिन्दा है, किसान की हालत पर सरकारें सिर्फ चुनावी रैलियों में शर्मिंदा हैं"


आपका युवा साथी:: राहुल काजल


मेरा पुराना लेख: 4अप्रैल2015


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